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गोष्ठी -पाके नरतन क्या खोया क्या पायाDr.surabhi Jain: Dr.surabhi Jain: संगोष्ठी आमंत्रण : ऑन लाइन ********************** विषय- “पाके नर तन, क्या खोया क्या पाया” दिनाँक- 20.11.2016 रविवार समय- दोपहर-3.00से 4.00 ग्रुप- “साधर्मी चर्चा” सम्पर्क- *संयोजक* डा.अरविन्दकुमार जैन , प्रिंसीपल, भीलवाडा।🙏 *संचालक गणतंत्र जैन* सर्वप्रथम संगोष्ठी के संयोजक को बहुत बहुत बधाई जो अनूठा उपक्रम संचालित किया…साथ ही बहुत ही सुन्दर विषय भी चुना…. आइये हम सभी विषय पर आयोजित संगोष्ठी में सम्मिलित हों और जानें समझें…कि *नरतन को पाकर हमने क्या खोया – क्या पाया* ..?? मैं निवेदन कर रहा हूं आ. संजीव जी गोधा से कि आज की संगोष्ठी की अध्यक्षता का पदभार ग्रहण करें….और हम सभी भी उनका हार्दिक अभिनन्दन करें… मंगलाचरण मंगलार्थी चिद्रूप मौ, सीमंधर जिनालय भीलवाडा *गणतन्त्र जी* सीमंधर जिनालय,भीलवाडा मंगलाचरणोपरान्त प्रथम विषय प्रस्तुत है…सभी पढें और विचार करें…आ. सुदीप जी भाईसाब का सुन्दर विश्लेषण पटल पर…. *प्रौ.डॉ.सुदीप जी शास्त्री , दिल्ली* नरभव की दुर्लभता का विचार + नरभव की सफलता का साधन + भवभ्रमण से लगे घोर थकान + निज ज्ञायक स्वभाव की अनंत महिमा + इंद्रियविषयों व भोगों की निःसारता — बस ये ही नरभव की सार्थकता का पाथेय है | साथ ही जिन्होंने नरभव को सफल किया है, मात्र उन्हीं ज्ञानियों की चर्या व चर्चा का समर्पित होकर चिंतन == फिर किसी से नहीं पूछना पड़ेगा कि नरभव सफल कैसे करें? यह सदाचार ( अपने जीवन में उतारने,अपनाने)का विषय है, शिष्टाचार ( मात्र बात करने की औपचारिकता ) का नहीं |🙏🏻🙏🏻🙏🏻 *संचालक* – नरभव की सफलता किसमें है..?? ये हमारे सामने आज भी यक्ष प्रश्न है…लेकिन जब ज्ञानियों को देखते हैं तो लगता है….कि मार्ग तो यही है….इसके अलावा और नहीं…बहुत ही सुन्दर विचार आ. सुदीप जी भाईसाब….🙏🙏 *सरिता जैन(चौधरी )भीलवाड़ा* आज इस संगोष्ठी ने यह सोचने को प्रेरित किया की हमने वास्तव मे यह नर तन पाकर क्या खोया और क्या पाया है गुरु देव के शब्दों मे यह भव हमें भव के अभाव के लिये मिला और हमने इसे विषयों की चाह करके उसकी पूर्ति के प्रयत्न मे ही गवाँ दिया ,इस मनुष्य भव मे आकर भी संसार को बढाने का ही कार्य किया ….लेकिन अभी भी हमारे पास जो भी समय उसे हम तत्व ज्ञान मे लगाकर अपने भव के अभाव करने का प्रयत्न कर सकते हैं हमारे पुण्योदय से हमे गुरु देव से प्राप्त तत्वज्ञान हमारे पास है उसको सुनने की रूचि भी है बस देर है तो निर्णय करने तो हम आज यह निर्णय करना है मुझे इस भव मे भव का अभाव करना ही है …जय जिनेन्र्द *सुखमाल जैन(चौधरी)भीलवाड़ा* पाके नर तन क्या खोया , क्या पाया विषय पर ज्यादा इच्छा तो विद्वानों के विचार जानने की है , फिर भी विषय अनुरूप एक भजन जो अक्सर गुनगुनाना अच्छा लगता है : – नरक में जिसने भावना भाइ मानुष तन को पाने की , वेष दिगम्बर धारण करके मुक्ती पथ पर जाने की , लेकिन देखो आज ये हालत ममता के दीवाने की चेतन होकर जड़ द्रव्यों से कैसा नाता जोड़ लिया । *संचालक* संगोष्ठी में आ. सरिताजी, सुखमाल जी ने अपने विचार प्रस्तुत किये साथ ही प्रेरित किया कि हम एक बार तो सोचें…क्या खोया..क्या पाया…??? वक्त ने जमाने को वो शमा़ दिखा डाला, अच्छे-अच्छे रुस्तम को खाक में मिला डाला, याद रख सिकन्दर के हौंसले तो आली थे, जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे..|` आइये उक्त पंक्ति पर विमर्श करते हुये विचार करें….धन समाज गज बाज राज तो काज न आवै, ज्ञान आपको रूप भयो, थिर अचल रहावै….. आखिर नरभव की सफलता किसमें…??








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9 Responses

  1. Profile photo of Dr.Surabhi Jain
    Dr.Surabhi Jain says

    जीवन के प्रत्येक आयोजन में अपने प्रयोजन को न भूलना ।

  2. Profile photo of Dr.Surabhi Jain
    Dr.Surabhi Jain says

    “Online जैन मंच ”
    S.No. 152
    दिनांक 25.01.2016
    साभार: डॉ.सुरभि जैन

    🌎 इच्छा का अंत नही 🌎
    एक राजा था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।वह नित्य अपने इष्ट देव को बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ ओर याद करता था। एक दिन मुनीश्वर के दर्शन गये तब उन्होंने अत्यंत करुणा पूर्वक कहा—“राजन् तुम निकट भव्य जीव हो बोलो तुम्हारी कोई इच्छा हॆ ?”
    प्रजा को चाहने वाला राजा बोला—“भगवन् मेरे पास भगवान का दिया सब कुछ है।आपकि कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक इच्छा है कि जैसे आपने मुझे ज्ञान देकर धन्य किया, प्रभु का दर्श कराया , वैसे हि मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।”
    “यह तो सम्भव नहीं हॆ।” —आचार्य देव ने राजा को समझाया ।परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा आचार्य भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर उन्होंने उसे भव्य जीव जानकर हाँ कह दिया वे बोले,–“ठीक हैं, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। में पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।”
    राजा अत्यन्त प्रसन्न. हुअा ओर आचार्य भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के निचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें ।

    दुसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा ओर स्वजनों को साथ लेकर पहाडी कि ओर चलने लगा। चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा मे से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो , इन तांबे के सिक्कों के पिछे अपना भाग्य को मत ठुकराओ।

    परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ एक प्रजा तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी कि ओर भाग गयी ओर सिक्कों कि गठरी बनाकर अपनी घर कि ओर चलने लगे। वे मन हि मन सोच रहे थे ,पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे।

    राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दुर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर कि ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऎसा मौका बार-बार नहीं मिलता हैं। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें
    इसी प्रकार कुछ दुर ओर चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया। अब तो प्रजाजनों मे बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों कि तरह सिक्कों कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों कि ओर चल दिये।

    अब केवल राजा और रानी ही शेष रह गये थे।राजा रानी से कहने लगे—“देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व हि नहीं जानते ! भगवान के सामने सारी दुनियां कि दौलत क्या चीज हैं ?” सही बात है –रानी ने राजा कि बात को समर्थ किया और वह आगे बढने लगे।

    कुछ दुर चलने पर राजा और रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखेरता हीरों का पहाड हैं।अब तो रानी से रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी , और हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साडी के पल्लु में भी बांधने लगी । रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों के प्रति तृष्णा कम नही हुई नहीं ,राजमहल में अपार हिरे माणिक्य भरे थे ‼ यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बडे दुःखद मन से राजा अकेले हि आगे बढते गये।

    वहाँ आचार्य भगवान उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। राजा को देखते ही वे मुसकुराये ओर पुछा –“कहाँ है तुम्हारी प्रजा ओर तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये उनका इन्तजार कर रहा हूँं।”

    राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।तब आचार्य भगवान ने राजा को समझाया–
    “राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को अपने आत्मिक सच्चे सुख से अधिक मानते है , उन्हें कदाचित प्रभु के पद की प्राप्ति नहीं हैं।
    उनकी इच्छाओ का अंत नही , यह संसार स्वार्थ से टिका है ,जीव को पंचेन्द्रिय विषय भोग की इच्छा भव अटवी में रुलाती हैं। ” तृष्णा की खाई खूब भरी पर रिक्त रही वह रिक्त रही।”
    हे भव्य आत्मन ! अपने स्वरूप का विचार करों यह दुर्लभ मनुष्य भव बीता जा रहा है। जीवन को समकित से सुरभित करो ,बुरा मत सोचो, सच्चे कर्म करके आत्मकल्याण कर !

  3. Profile photo of
    Amit Shah says

    gyanedra is doing good work for jain dharm prabhavna

  4. Profile photo of Sandeepjain
    Sandeepjain says

    जय जिनेन्द्र सभी को।
    इस मंच का सदस्य बनकर मैं अपनेसौभाग्यशालीशिलार मानता हूँ।इस मंच की शिला रखने वाले व इे यहाँ तक पहुँचाने में. योगदान देने वाले सभी सदस्यों को धन्यवाद।

  5. Profile photo of Richa Jain
    Richa Jain says

    feeling vei happy to join all of you vei nice posting bhaiya ji

  6. Profile photo of Sunita Jain
    Sunita Jain says

    Bahut sundar posting bhai Ji