9 thoughts on “Home

  1. जय जिनेन्द्र सभी को।
    इस मंच का सदस्य बनकर मैं अपनेसौभाग्यशालीशिलार मानता हूँ।इस मंच की शिला रखने वाले व इे यहाँ तक पहुँचाने में. योगदान देने वाले सभी सदस्यों को धन्यवाद।

  2. “Online जैन मंच ”
    S.No. 152
    दिनांक 25.01.2016
    साभार: डॉ.सुरभि जैन

    ? इच्छा का अंत नही ?
    एक राजा था।वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था।वह नित्य अपने इष्ट देव को बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ ओर याद करता था। एक दिन मुनीश्वर के दर्शन गये तब उन्होंने अत्यंत करुणा पूर्वक कहा—“राजन् तुम निकट भव्य जीव हो बोलो तुम्हारी कोई इच्छा हॆ ?”
    प्रजा को चाहने वाला राजा बोला—“भगवन् मेरे पास भगवान का दिया सब कुछ है।आपकि कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक इच्छा है कि जैसे आपने मुझे ज्ञान देकर धन्य किया, प्रभु का दर्श कराया , वैसे हि मेरी सारी प्रजा को भी दर्शन दीजिये।”
    “यह तो सम्भव नहीं हॆ।” —आचार्य देव ने राजा को समझाया ।परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा आचार्य भगवान् से जिद्द् करने लगा। आखिर उन्होंने उसे भव्य जीव जानकर हाँ कह दिया वे बोले,–“ठीक हैं, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाडी के पास लाना। में पहाडी के ऊपर से दर्शन दूँगा।”
    राजा अत्यन्त प्रसन्न. हुअा ओर आचार्य भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड के निचे मेरे साथ पहुँचे,वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें ।

    दुसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा ओर स्वजनों को साथ लेकर पहाडी कि ओर चलने लगा। चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा मे से कुछ एक उस ओर भागने लगे।तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो , इन तांबे के सिक्कों के पिछे अपना भाग्य को मत ठुकराओ।

    परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत कुछ एक प्रजा तांबे कि सिक्कों वाली पहाडी कि ओर भाग गयी ओर सिक्कों कि गठरी बनाकर अपनी घर कि ओर चलने लगे। वे मन हि मन सोच रहे थे ,पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल लेगे।

    राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दुर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड दिखाई दिया।इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर कि ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि,ऎसा मौका बार-बार नहीं मिलता हैं। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल जायेगें
    इसी प्रकार कुछ दुर ओर चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड नजर आया। अब तो प्रजाजनों मे बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे। वे भी दूसरों कि तरह सिक्कों कि गठरी लाद कर अपने-अपने घरों कि ओर चल दिये।

    अब केवल राजा और रानी ही शेष रह गये थे।राजा रानी से कहने लगे—“देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व हि नहीं जानते ! भगवान के सामने सारी दुनियां कि दौलत क्या चीज हैं ?” सही बात है –रानी ने राजा कि बात को समर्थ किया और वह आगे बढने लगे।

    कुछ दुर चलने पर राजा और रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखेरता हीरों का पहाड हैं।अब तो रानी से रहा नहीं गया,हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी , और हीरों कि गठरी बनाने लगी ।फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साडी के पल्लु में भी बांधने लगी । रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,परंतु हीरों के प्रति तृष्णा कम नही हुई नहीं ,राजमहल में अपार हिरे माणिक्य भरे थे ‼ यह देख राजा को अत्यन्त ग्लानि ओर विरक्ति हुई।बडे दुःखद मन से राजा अकेले हि आगे बढते गये।

    वहाँ आचार्य भगवान उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। राजा को देखते ही वे मुसकुराये ओर पुछा –“कहाँ है तुम्हारी प्रजा ओर तुम्हारे प्रियजन। मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये उनका इन्तजार कर रहा हूँं।”

    राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया।तब आचार्य भगवान ने राजा को समझाया–
    “राजन जो लोग भौतिक सांसारिक प्राप्ति को अपने आत्मिक सच्चे सुख से अधिक मानते है , उन्हें कदाचित प्रभु के पद की प्राप्ति नहीं हैं।
    उनकी इच्छाओ का अंत नही , यह संसार स्वार्थ से टिका है ,जीव को पंचेन्द्रिय विषय भोग की इच्छा भव अटवी में रुलाती हैं। ” तृष्णा की खाई खूब भरी पर रिक्त रही वह रिक्त रही।”
    हे भव्य आत्मन ! अपने स्वरूप का विचार करों यह दुर्लभ मनुष्य भव बीता जा रहा है। जीवन को समकित से सुरभित करो ,बुरा मत सोचो, सच्चे कर्म करके आत्मकल्याण कर !

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